“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग

सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।

श्लोक 14.26

संस्कृत श्लोक

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ||१४-२६||
māṃ ca yo.avyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate .
sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate ||14-26||

हिंदी अर्थ

।।14.26।। जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।

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