“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग

सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।

श्लोक 14.19

संस्कृत श्लोक

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ||१४-१९||
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati .
guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so.adhigacchati ||14-19||

हिंदी अर्थ

।।14.19।। जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

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