“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग

सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।

श्लोक 14.2

संस्कृत श्लोक

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||१४-२||
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ .
sarge.api nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||14-2||

हिंदी अर्थ

।।14.2।। इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।

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