अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग
सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।
श्लोक 14.7
संस्कृत श्लोक
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् |
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ||१४-७||
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ||१४-७||
rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam .
tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam ||14-7||
tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam ||14-7||
हिंदी अर्थ
।।14.7।। हे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।
▶ वीडियो (YouTube)
इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 14.7 → YouTube Video URL
