“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.4

संस्कृत श्लोक

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः |
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||५-४||
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ .
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||5-4||

हिंदी अर्थ

।।5.4।। बालक अर्थात् बालबुद्धि के लोग सांख्य (संन्यास) और योग को परस्पर भिन्न समझते हैं;  किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।।

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