“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.15

संस्कृत श्लोक

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः |
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ||५-१५||
nādatte kasyacitpāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ .
ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||5-15||

हिंदी अर्थ

।।5.15।। विभु परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न पुण्यकर्म को ही ग्रहण करता है;  (किन्तु) अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है,  इससे सब जीव मोहित होते हैं।।

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