“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.20

संस्कृत श्लोक

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् |
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ||५-२०||
na prahṛṣyetpriyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam .
sthirabuddhirasammūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ ||5-20||

हिंदी अर्थ

।।5.20।। जो स्थिरबुद्धि,  संमोहरहित ब्रह्मवित् पुरुष ब्रह्म में स्थित है,  वह प्रिय वस्तु को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता।।

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