“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.25

संस्कृत श्लोक

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः |
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ||५-२५||
labhante brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ .
chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ ||5-25||

हिंदी अर्थ

।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं - जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, जो छिन्नसंशय, संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।

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