“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.2

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच |
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ |
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ||५-२||
śrībhagavānuvāca .
saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau .
tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate ||5-2||

हिंदी अर्थ

।।5.2।। श्रीभगवान् ने कहा --  कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं;  परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।

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