अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग
सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।
श्लोक 14.12
संस्कृत श्लोक
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा |
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||१४-१२||
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||१४-१२||
lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā .
rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ||14-12||
rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ||14-12||
हिंदी अर्थ
।।14.12।। हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।
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