“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग

राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।

श्लोक 9.3

संस्कृत श्लोक

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ||९-३||
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa .
aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani ||9-3||

हिंदी अर्थ

।।9.3।। हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

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