“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.22

संस्कृत श्लोक

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते |
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ||५-२२||
ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te .
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||5-22||

हिंदी अर्थ

।।5.22।। हे कौन्तेय (इन्द्रिय तथा विषयों के) संयोग से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं वे दु:ख के ही हेतु हैं, क्योंकि वे आदि-अन्त वाले हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें नहीं रमता।।

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