“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

कर्मयोग और संन्यास के समन्वय का विवेचन।

श्लोक 5.3

संस्कृत श्लोक

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||५-३||
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati .
nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate ||5-3||

हिंदी अर्थ

।।5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा,  वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है;  क्योंकि,  हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।

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