“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 6 – ध्यानयोग

मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।

श्लोक 6.13

संस्कृत श्लोक

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ||६-१३||
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ .
samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan ||6-13||

हिंदी अर्थ

।।6.13।। काया, सिर और ग्रीवा को समान और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर अपनी नासिका के अग्र भाग को देखकर अन्य दिशाओं को न देखता हुआ।।

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