अध्याय 6 – ध्यानयोग
मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।
श्लोक 6.8
संस्कृत श्लोक
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः |
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ||६-८||
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ||६-८||
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ .
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ||6-8||
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ||6-8||
हिंदी अर्थ
।।6.8।। जो योगी ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित (कूटस्थ) और जितेन्द्रिय है, जिसको मिट्टी, पाषाण और कंचन समान है, वह (परमात्मा से) युक्त कहलाता है।।
▶ वीडियो (YouTube)
इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 6.8 → YouTube Video URL
