“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 6 – ध्यानयोग

मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।

श्लोक 6.34

संस्कृत श्लोक

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् |
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ||६-३४||
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham .
tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram ||6-34||

हिंदी अर्थ

।।6.34।। क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।

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