“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 6 – ध्यानयोग

मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।

श्लोक 6.41

संस्कृत श्लोक

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः |
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ||६-४१||
prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ .
śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo.abhijāyate ||6-41||

हिंदी अर्थ

।।6.41।। योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर वहाँ दीर्घकाल तक वास करके शुद्ध आचरण वाले श्रीमन्त (धनवान) पुरुषों के घर में जन्म लेता है।।

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