“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 6 – ध्यानयोग

मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।

श्लोक 6.9

संस्कृत श्लोक

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ||६-९||
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu .
sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||6-9||

हिंदी अर्थ

।।6.9।। जो पुरुष सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बान्धवों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।।

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