“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 6›Shloka 2

अध्याय 6 – ध्यानयोग

मन के नियंत्रण और ध्यानयोग की साधना।

श्लोक 6.2

संस्कृत श्लोक

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||६-२||
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava .
na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana ||6-2||

हिंदी अर्थ

।।6.2।। हे पाण्डव ! जिसको (शास्त्रवित्) संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 6.2 → YouTube Video URL