“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.13

संस्कृत श्लोक

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||२-१३||
dehino.asminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā .
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||2-13||

हिंदी अर्थ

।।2.13।। जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

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