“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.21

संस्कृत श्लोक

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||२-२१||
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam .
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||2-21||

हिंदी अर्थ

।।2.21।। हे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी,  नित्य और अव्ययस्वरूप जानता है,  वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?

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