“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 2›Shloka 44

अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.44

संस्कृत श्लोक

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२-४४||
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām .
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||2-44||

हिंदी अर्थ

।।2.44।।उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 2.44 → YouTube Video URL