“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 2›Shloka 24

अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.24

संस्कृत श्लोक

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ||२-२४||
acchedyo.ayamadāhyo.ayamakledyo.aśoṣya eva ca .
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo.ayaṃ sanātanaḥ ||2-24||

हिंदी अर्थ

।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती),  अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती),  अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है;  यह नित्य,  सर्वगत,  स्थाणु (स्थिर),  अचल और सनातन है।।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 2.24 → YouTube Video URL