“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.26

संस्कृत श्लोक

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||२-२६||
atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam .
tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitumarhasi ||2-26||

हिंदी अर्थ

।।2.26।। और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी,  हे महाबाहो !  इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।

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