अध्याय 2 – सांख्ययोग
आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।
श्लोक 2.36
संस्कृत श्लोक
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||२-३६||
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||२-३६||
avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ .
nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim ||2-36||
nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim ||2-36||
हिंदी अर्थ
।।2.36।। तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे, फिर उससे अधिक दु:ख क्या होगा ?
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