अध्याय 2 – सांख्ययोग
आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।
श्लोक 2.51
संस्कृत श्लोक
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||२-५१||
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||२-५१||
karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ .
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam ||2-51||
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam ||2-51||
हिंदी अर्थ
।।2.51।। बुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
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