“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.22

संस्कृत श्लोक

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२-२२||
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro.aparāṇi .
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāni anyāni saṃyāti navāni dehī ||2-22||

हिंदी अर्थ

।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

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