“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.33

संस्कृत श्लोक

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||२-३३||
atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi .
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||2-33||

हिंदी अर्थ

।।2.33।। और यदि तुम इस धर्मयुद्ध को स्वीकार नहीं करोगे,  तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।।

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