“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.64

संस्कृत श्लोक

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | (or वियुक्तैस्तु)
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||२-६४||
rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran .
orviyuktaistu ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||2-64||

हिंदी अर्थ

।।2.64।। आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रस्ेााद) प्राप्त करता है।।

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