“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 2 – सांख्ययोग

आत्मा का स्वरूप, कर्म, ज्ञान और समत्व की मूल शिक्षाएँ।

श्लोक 2.66

संस्कृत श्लोक

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||२-६६||
nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā .
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ||2-66||

हिंदी अर्थ

।।2.66।। (संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ

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