“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 10 – विभूतियोग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

श्लोक 10.17

संस्कृत श्लोक

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् |
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ||१०-१७||
kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan .
keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo.asi bhagavanmayā ||10-17||

हिंदी अर्थ

।।10.17।। हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ, और हे भगवन् ! आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं।।

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