“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 10 – विभूतियोग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

श्लोक 10.28

संस्कृत श्लोक

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् |
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ||१०-२८||
āyudhānāmahaṃ vajraṃ dhenūnāmasmi kāmadhuk .
prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ ||10-28||

हिंदी अर्थ

।।10.28।। मैं शस्त्रों में वज्र और धेनुओं (गायों) में कामधेनु हूँ, प्रजा उत्पत्ति का हेतु कन्दर्प (कामदेव) मैं हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।।

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