“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 10 – विभूतियोग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

श्लोक 10.2

संस्कृत श्लोक

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः |
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ||१०-२||
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ .
ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||10-2||

हिंदी अर्थ

।।10.2।। मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।

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