“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 10 – विभूतियोग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

श्लोक 10.18

संस्कृत श्लोक

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन |
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||१०-१८||
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana .
bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me.amṛtam ||10-18||

हिंदी अर्थ

।।10.18।। हे जनार्दन ! अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन: विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।

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