“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 10 – विभूतियोग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

श्लोक 10.5

संस्कृत श्लोक

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः |
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ||१०-५||
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo.ayaśaḥ .
bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ ||10-5||

हिंदी अर्थ

।।10.5।। अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान. यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।

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