“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.21

संस्कृत श्लोक

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् |
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ||१८-२१||
pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān .
vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam ||18-21||

हिंदी अर्थ

।।18.21।। जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्-पृथक् जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

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