“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.77

संस्कृत श्लोक

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः |
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||१८-७७||
tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ .
vismayo me mahān rājanhṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ||18-77||

हिंदी अर्थ

।।18.77।। हे राजन ! श्री हरि के अति अद्भुत रूप को भी पुन: पुन: स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।।

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