“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.53

संस्कृत श्लोक

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् |
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ||१८-५३||
ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ parigraham .
vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate ||18-53||

हिंदी अर्थ

।।18.53।। अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है।।

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