“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.65

संस्कृत श्लोक

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||१८-६५||
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru .
māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo.asi me ||18-65||

हिंदी अर्थ

।।18.65।। तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।।

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