“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.30

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये |
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||१८-३०||
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye .
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī ||18-30||

हिंदी अर्थ

।।18.30।। हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।।

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त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

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