“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.57

संस्कृत श्लोक

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः |
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ||१८-५७||
cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ .
buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava ||18-57||

हिंदी अर्थ

।।18.57।। मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो।।

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