“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.24

संस्कृत श्लोक

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः |
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||१८-२४||
yattu kāmepsunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ .
kriyate bahulāyāsaṃ tadrājasamudāhṛtam ||18-24||

हिंदी अर्थ

।।18.24।। और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल की कामना वाले, अहंकारयुक्त पुरुष के द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।।

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