“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.6

संस्कृत श्लोक

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च |
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||१८-६||
etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca .
kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam ||18-6||

हिंदी अर्थ

।।18.6।। हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।

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