“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.31

संस्कृत श्लोक

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च |
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ||१८-३१||
yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca .
ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||18-31||

हिंदी अर्थ

।।18.31।। हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथावत् नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है।।

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