“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग

त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

श्लोक 18.54

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति |
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||१८-५४||
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati .
samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām ||18-54||

हिंदी अर्थ

।।18.54।। ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।।

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त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का समग्र उपसंहार।

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